PRIMARY vs CONVENT SCHOOL : सरकारी विद्यालय पर उँगली उठाने से पहले ज़रा इन सवालों पर भी सोचिए
क्या हम उस बच्चे की तुलना कर सकते हैं
जिसके माता-पिता खुद कहते हैं—“आज स्कूल मत जाओ, खेत में काम करना है”?
क्या हम उस बच्चे को समझते हैं
जो बिना नाश्ता किए, खाली पेट स्कूल पहुँचता है और उसी हालत में पढ़ने की कोशिश करता है?
क्या हम उस बच्चे से उम्मीद करते हैं
जिसके पास पेन-पेंसिल तक नहीं, और जिसकी यूनिफॉर्म का पैसा भी घर की मजबूरियों में खर्च हो जाता है?
क्या हर अभिभावक अपने बच्चे को रोज़ तैयार करके स्कूल भेजता है?
क्या उन बच्चों की तुलना सही है
जिनके पास न तय दिनचर्या है, न सही मार्गदर्शन?
सच्चाई यह है कि कई अभिभावक बच्चों को केवल सरकारी योजनाओं के लाभ के लिए स्कूल भेजते हैं।
उनका ध्यान अक्सर सिर्फ मिड-डे मील तक सीमित रह जाता है,
लेकिन यह सवाल कम ही पूछा जाता है—
“आज मेरे बच्चे ने क्या सीखा?”
सरकारी स्कूल पीछे नहीं हैं…
बस वहाँ पढ़ने वाले बच्चों के हालात कठिन हैं।
तुलना मत कीजिए…
समझिए, सहयोग दीजिए, तभी असली बदलाव आएगा।

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