हिमाचल प्रदेश सरकार ने शिक्षकों के हित में लिया बड़ा निर्णय, इस कार्य से मिली मुक्ति

 हिमाचल प्रदेश सरकार ने शिक्षकों के हित में लिया बड़ा निर्णय, इस कार्य से मिली मुक्ति




हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा शिक्षक डायरी को समाप्त करने का निर्णय केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं है, बल्कि उस जमीनी सच्चाई की स्वीकारोक्ति है, जिसे शिक्षक वर्षों से भोगते आए हैं। शिक्षक डायरी के पक्ष में दिए जाने वाले तर्क सैद्धांतिक रूप से आकर्षक लगते हैं—योजना, तैयारी, मूल्यांकन और आत्ममंथन का दस्तावेज़—पर व्यवहार में यह दस्तावेज़ कब शिक्षण सुधार का औज़ार बना और कब काग़ज़ी अनुपालन का बोझ, इसका अंतर शायद नीतियाँ बनाने वालों ने कभी गंभीरता से नहीं परखा। यदि ईमानदारी से आंकलन किया जाए तो यह कहना पड़ेगा कि शिक्षक डायरी अपने मूल उद्देश्य से भटक चुकी है और अब केवल छापने, भरने और दिखाने की प्रक्रिया बनकर रह गई है।


आज की वास्तविकता यह है कि शिक्षक का अधिकांश समय कक्षा की तैयारी में नहीं, बल्कि योजनाओं, उपक्रमों, रिपोर्टों, ऐप्स और आदेशों की पूर्ति में खप रहा है। शिक्षक डायरी इस बोझ के बीच आत्मचिंतन का माध्यम बनने के बजाय एक और औपचारिकता बन गई है। व्हाट्सएप समूहों में प्रतिदिन शिक्षक डायरी की मांग और उसकी नकल इस बात का स्पष्ट संकेत है कि यह व्यवस्था अपने उद्देश्य में विफल हो चुकी है। यदि डायरी वास्तव में शिक्षण गुणवत्ता बढ़ा रही होती, तो उसकी नकल की ज़रूरत ही क्यों पड़ती? नकल का अर्थ यही है कि सामग्री शिक्षक के मन और कक्षा से नहीं, बल्कि दबाव और डर से पैदा हो रही है।


हिमाचल प्रदेश के निर्णय का सबसे सकारात्मक पक्ष यह है कि सरकार ने यह स्वीकार किया कि भरोसे के बिना शिक्षा नहीं चल सकती। शिक्षक को हर दिन प्रमाणित करने की मानसिकता छोड़कर उसे शिक्षण पर केंद्रित करने की दिशा में यह एक साहसिक कदम है। शिक्षक डायरी हटाने का अर्थ यह नहीं कि शिक्षक की जवाबदेही खत्म हो गई, बल्कि इसका अर्थ है कि जवाबदेही को काग़ज़ से निकालकर कक्षा और सीखने के परिणामों से जोड़ा गया। यही शिक्षा नीति 2020 की मूल भावना भी है—लचीलापन, नवाचार और शिक्षक की पेशेवर स्वायत्तता।


उत्तर प्रदेश जैसे विशाल शैक्षिक तंत्र में शिक्षक डायरी का बोझ कहीं अधिक विकराल रूप ले चुका है। यहाँ यह केवल एक डायरी नहीं, बल्कि भय और अनुपालन का प्रतीक बन गई है। निरीक्षण, फोटो, हस्ताक्षर और रिपोर्ट—इन सबके बीच शिक्षण कहीं पीछे छूट जाता है। यदि हिमाचल जैसे राज्य यह स्वीकार कर सकते हैं कि डायरी से शिक्षण में अपेक्षित सुधार नहीं आ रहा, तो उत्तर प्रदेश में इस पर बहस से डर क्यों? क्या हम आज भी यह मानते हैं कि शिक्षक बिना काग़ज़ी निगरानी के ईमानदारी से पढ़ा ही नहीं सकता?


यह लेख शिक्षक डायरी के सभी लाभों को नकारने के लिए नहीं है। समस्या डायरी की अवधारणा में नहीं, उसे लागू करने के तरीके और उस पर थोपे गए प्रशासनिक दबाव में है। जब तक शिक्षक को गैर-शैक्षणिक कार्यों से मुक्त नहीं किया जाएगा, तब तक कोई भी डायरी, ऐप या पोर्टल शिक्षा को बेहतर नहीं बना सकता। हिमाचल प्रदेश का निर्णय हमें यह सोचने का अवसर देता है कि क्या हम शिक्षकों पर भरोसा करने का साहस दिखा सकते हैं।


अब समय आ गया है कि उत्तर प्रदेश में भी शिक्षक डायरी को लेकर ईमानदार समीक्षा हो। यदि वह अपने उद्देश्य को पूरा नहीं कर पा रही, यदि वह शिक्षण के बजाय तनाव और दिखावे को बढ़ावा दे रही है, तो उसे जारी रखना केवल व्यवस्था की जड़ता को दर्शाता है। शिक्षा सुधार काग़ज़ कम करने से नहीं, शिक्षक को समय और सम्मान लौटाने से होगा। हिमाचल ने पहल की है, अब प्रश्न यह है कि क्या उत्तर प्रदेश इस बहस से भागेगा या शिक्षा के हित में एक साहसिक निर्णय लेने का आत्मविश्वास दिखाएगा।

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